31 December, 2010

दिल छूनेवाली एक छोटी कहानी...

एक आदमी रात को देर से, दिन भर के काम के बाद थके और मन में गुस्सा भरे, चिढा हुआ अपने घर पहूँचा, तो देखा कि उसका पाँच साल का लडका इंतज़ार कर रहा था। अपने पिता को देखते ही
उसने पूछा - " बापूजी
, क्या मैं आप से एक प्रश्न पूछूँ ? "

आदमी - " क्या है बेटे, पूछो, पूछो ।"
बेटा - " बापूजी, बापूजी, आप एक घंटे में कितना कमाते हैं ? "
" अरे चुप, तुम्हें इस से क्या लेना - देना
" - नाराज़गी के साथ आदमी बोला।
बेटा - " मैं जानना चाहता हूँ बापूजी, मुझे बताइए प्लीस।"

" अगर तुम जानना ही चाहते हो तो लो, एक सौ रुपया
प्रति घंटा।"
(बेटे की चेहरे की खुशी मानो गायब।) वह बहुत उदा
सी के साथ - " बापूजी, आप मुझे पचास रुपये देंगे ? " आदमी बहुत क्रोधी हुआ - " क्यों बहस कर रहे हो ?, तू इतना नासमझ क्यों है ?, कोई तुच्छ वस्तु खरीदने के लिए ऐसी बकवास ?, चुपचाप जाओ अपने कमरे में और सोचो कि तू इतना स्वार्थी कैसे बना ?"
बेटा चुपचाप अपने कमरे गया और दरवाज़ा बंद किया ।
आदमी बैठकर अपने बेटे के बारे में सोचने लगा तो और भी ज़्यादा नाराज़ हो गया - "उस को इतना हिम्मत कहाँ से मिला कि ऐसा सवाल करने लगा ?? "


लगभग एक घंटे के बाद आदमी की नाराज़गी ज़रा शाँत हुई, वह सोचने लगा - " अगर असल में उस को किसी चीज़ की ज़रूरत होगी, वह हमेशा तो रूपया पूछता तो नहीं, आखिर वह मेरा बेटा है न ?"
आदमी अपने बेटे के कमरे गया और दरवाज़ा खोला - " बे
टा, क्या तू सो गया बेटा ?"
"नहीं बापूजी, मैं अभी तक सोया नहीं । "
"तू मुझ से नाराज़ तो नहीं हो न बेटा ",आदमी बोला, "आजकल काम की अधिकता है न, इसीलिए । लो बेटा, यह लो पचास रूपये ।"

बच्चे के चेहरे पर खुशी की झलक दौड आयी, वह उठकर बैठा और अपने तकिये के नीचे कुछ ढूँढने लगा । थोडी देर बाद उस के हाथों में कुछ रुपये थे, और वह उसे गिनने लगा । आदमी यह देखकर फिर से गुस्सा होने लगा ।

बच्चा धीरे-धीरे गिना और बडी खुशी से अपने पिताजी को देखा ।
" तेरे पास पैसे थे, फिर तू ने और क्यों माँगा ?"

" मेरे पास उतने थे नहीं, पर अब है। "- बच्चा बहुत ही खुशी से बोला, " बापूजी, अब मेरे पास एक सौ रुपये हैं, क्या मैं आप का एक घंटा खरीद सकता हूँ ?, कल शाम को मैं आप के साथ खाना खाना चाहता हूँ। प्लीस, आप कल एक घंटा पहले घर आएँगे ? " यह सुनकर आदमी मानो स्तब्ध हो गया।
उस ने बच्चे को गले लगाया, और अपने किये पर क्षमा माँगने लगा ।




यह तो सिर्फ एक याद दिलाना है जो अपने जीवन में कठिन काम करते हैं, और समय को यूँ ही अपने हाथों से नष्ट कर देते हैं, जो समय अपनों के साथ बिताना था, अपने दिल के निकट रहनेवालों के साथ... याद रखिए कि कम से कम सौ रुपये का समय अपनों के साथ बिताने की कोशिश तो करें आज से । हम सब को एक न एक दिन इस दुनिया छोडकर चला जाना है, और हम जिसके लिए काम करते हैं, वे कुछ ही दिनों में हमारा स्थान किसी और को दे देंगे । पर हमारे दोस्त और रिश्तेदार के दिलों में उनके बीत जाने तक हम जिएँगे, तो कुछ सोच विचार करें, हम काम पर ज़्यादा बिताते हैं कि घर पर ???

18 November, 2010

फूल और काँटा - हरिऔध जी


हैं जन्म लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता

मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बहीं
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं ।

छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भँवर का है भेद देता श्याम तन

फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला

है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम दे
जो किसी में हो बड़प्पन की कसर ।

एक कविता जो केरल के छात्रों के कलोल्सवों के लिए उपयुक्त :-
अवलम्ब : विकिपीडिया , अन्य वेब साइट्स ...

15 September, 2010

एक भिखारी की आत्म कहानी

जाडे का प्रात:काल था। शरीर को कम्पित करनेवाला शीत पड रहा था। घर के सारे व्यक्ति बैठे हुए चाय पी रहे थे। आनन्द का वातावरण अपनी चरम सीमा पर था - तभी द्वार पर से किसी ने पुकारा, " भगवान तुम्हारा भला करे, दो रोटी का आटा दिला दो।" इस एक पुकार की तो हम में से किसी ने लेशमात्र भी चिन्ता न की, परंतु जब थोडी देर के बाद पुन: वही करुण एवं दीनता से भरे हुए शब्द सुनाई पडे तो मैं उठा। उस समय मेरे मन में उस भिक्षुक के प्रति दया नहीं थी बल्कि मैं सोच रहा था कि ये भिक्षुक कार्य क्यों नहीं करते? ये समाज पर भार बनकर क्यों रहते हैं? इस प्रकार के विचारों में निमग्न मैं दरवाज़े पर गया। वहाँ एक दीन वृद्ध भिखारी को देखा, जो ठंड के कारण थर-थर काँप रहा था। भूख के कारण रो रहा था। जाडे से बचने के लिए उसके पास पर्याप्त वस्त्र भी नहीं थे। मैं ने कहा, "आओ अंदर, मैं तुम्हें भोजन दे दूँगा।" और वह भिखारी घर के भीतर चला आया। मैं ने उसे खाने के लिए रोटियाँ दीं और वह खाने लगा। भोजन करके जब वह निवृत्त हुआ तो मैं ने पूछा, "तुम इस वेदना एवं दुख से भरी हुई अवस्था को किस प्रकार प्राप्त हुए?”

मेरे इस प्रश्न को सुनकर क्षण भर उसने मेरी ओर देखा और बोला – “बाबूजी, इन बातों में क्या लोगे? यदि जानना ही चाहते हो तो सुनो। जहाँ तक मुझे याद है, जब मैं छोटा था तब मेरे घर में किसी प्रकार का अभाव नहीं था। किन्तु समय बदलता रहता है, क्योंकि कभी दिवस है और कभी अँधेरी रात। किसी मनुष्य को सर्वदा सुख नहीं मिला करता और यही मेरे साथ भी हुआ था।

मैं एक किसान परिवार का सदस्य हूँ। मेरे पूर्वज खेती करते थे। मैं भी पहले खेती करता था। जब आय कम और खर्च ज़्यादा पडने लगे तो गाँव के ज़मींदार से कर्ज़ लेकर खेती करने लगा। कर्ज़ कैसे चुकाता? पहले तो बैल बेचा। अंत में खेत को गिरवी रखकर कर्ज़ चुकाया। फिर क्या करूँ? अब तो खेत भी नहीं रहा और मैं किसान भी नहीं रहा।

पहले मज़्दूरी करता था। खेती के अलावा कुछ जानता भी नहीं था। कहीं नौकरी करके जीवन बिता लूँ तो कहाँ मिलती है इस बुढे को नौकरी ?

बाबूजी, समाज हमें फटकारता है। पर क्या वह कभी सोचता है कि इतने भूखों की जीविका का प्रबंध कैसे किया जाय ? भिक्षा तो हम लोगों को विवश होकर माँगनी पडती है। कौन ऐसा होगा, जो कि मेहनत व मज़दूरी करने के बजाय दर-दर फटकार सुनने के लिए जाएगा ? भिखारी तो जीवित ही मृतक के समान होता है। मैं भी अब निराश्रित होकर भीख माँगता फिरता हूँ, यदि भीख न माँगूँ तो इस वृद्ध अवस्था में क्या करूँ ? आँखों से दिखाई नहीं देता, दो डग चलने पर कदम लडखडाने लगते हैं।

भिखारी के जीवन की इस कष्टमय कहानी सुनकर मेरी आँखों से आँसू निकल पडे। मैं ने सोचा, मनुष्य का भाग्य कितना क्रूर होता है ! मनुष्य को वह कितना बदल डालता है।

अवलम्ब : आदर्श हिंदी निबंध

14 September, 2010

आज हिंदी दिवस

प्यारे अध्यापक बंधुओं, केरल के स्कूलों में इस शुभ अवसर पर हम क्या-क्या कार्यक्रम चला सकते हैं ?

प्रातः सभा में प्रार्थना गीत।

प्रातः सभा में भाषण (विषय - राष्ट्रभाषा का महत्व)

प्रातः सभा में चर्चा (विषय – नई पीढी की दृष्टि में भाषा का उपयोग)

प्रातः सभा में कविता आलापन।

स्कूल की हिंदी सभा में प्रतियोगिताएँ - वाचन, लेखन आदि।


आप के लिए एक प्रार्थना गीत --

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें
दूसरों की जय से पहले, खुद की जय करें
हम को मन की शक्ति देना ...

भेद-भाव अपने दिल से, साफ़ कर सकें
दूसरों से भूल हो तो, माफ़ कर सकें
झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें
दूसरों की जय से पहले, खुद की जय करें
हम को मन की शक्ति देना ...

मुश्किलें पड़ें तो हम पे, इतना कर्म कर
साथ दें तो धर्म का, चलें तो धर्म पर
खुद पे हौसला रहे, सच का दम भरें
दूसरों की जय से पहले, खुद की जय करें
हम को मन की शक्ति देना ...

देखें इसकी विडियो ...

सारे हिंदुस्तानियों और हिंदी प्रेमियों को हिंदी दिवस की शुभ कामनाएँ !

10 September, 2010

आखिर, ईश्वर है कि नहीं ???

एक दिन एक आदमी नाई की दूकान अपने बाल काटने और दाढी काट छाँट करने गया। जैसे ही नाई ने अपना काम शुरू किया, दोनों ने बातें करना भी शुरू किया। उन दोनों ने कई बातें की, और बातें करते करते ईश्वर के बारे में चर्चा शुरू किया।

नाई बोला, "ईश्वर का कोई अस्तित्व है, इस पर मैं विश्वास नहीं रखता।"

ग्राहक ने पूछा, "भई, ऐसा क्यों कहते हो, यह अनुचित है। "

जवाब में नाई बोला, "आप बाहर जाकर गलियों में देखिए, तब पता जाएगा कि इस दुनिया में ईश्वर का कोई अस्तित्व है कि नहीं।
अगर
इस दुनिया में ईश्वर का कोई अस्
तित्व होता तो, लोगों को बीमारियाँ क्यों लगती , दर्द क्यों सहनी पडती ?
अनाथ
बच्चे, भुखमरे, लंगडे, अंधे ये सब क्यों हैं यहाँ ?
ईश्वर
ऐसा क्यों होने देता है ?"


हमारे ग्राहक भैया ने पहले सोचा, फिर चुप हो गये। उन्होंने कुछ ज्य़ादा कहना नहीं चाहा।

नाई ने काम पूरा किया और ग्राहक पैसे देकर बाहर चला गया।
जैसे
ही ग्राहक नाई की दूकान से बाहर निकला, उसकी नज़रें एक बूढे आदमी पर पडीं।
वह
बूढा आदमी बहुत ही दर्दनाक स्थिती में था।
वह बहुत गंदा और लंबे लंबे बिखरे बालोंवाला था, उसके दाढी और केश कर्तन किए मानो, कई साल हो गये हो।
ग्राहक
के दिमाग में कोई सोच घुसकर आयीं।

वह
तुरंत वापस नाई के दूकान का दरवाज़ा खोला, और नाई से बोला,
"इस दुनिया में नाई लोग खतम हो गये हैं। "

यह सुनकर नाई बेचैन हो गया। उसने पूछा, " ऐसी क्या बात हो गयी? अभी अभी तो मैं ने आप के केश कर्तन किये थे, मैं एक नाई हूँ। "


ग्राहक बोला, " अगर आप नाई हैं तो यहाँ लंबे लंबे बिखरे बाल और दाढीवाला आदमी क्यों है, जैसे बाहर दीख रहा है ? "

"ओह, ऐसी बात?", नाई बोला, "वह तब होता है, जब लोग नाई के पास नहीं आते।"

हाँ, हाँ, वही बात।, ग्राहक ने दृढतापूर्वक कहा ,वही बात है, वास्तव में कि ईश्वर का अस्तित्व है।

इतनी आफत और परेशानियाँ लोगों को होती है तो इसका दोष ईश्वर पर मत डालोलोगों के मन में ईश्वर का विचार नहीं है, इसलिए सब वेदनाएँ होती है।।।

तेरा साई तुझ में, ज्यों पुहुपन में बाँस
कस्तूरी
का मिरग ज्यों ढूँढै फिरि फिरि घास ।।

07 September, 2010


कहानी - प्यार, विजय और धन की

एक घर में साँस, ससुर और बहू रहते थे। एक दिन साँस घर के बाहर आयी तो उसने देखा कि तीन बूढे आदमी घर के सामने एक पेड के नीचे बैठे हैं। उनको देखकर साँस ने सोचा कि वे भिखारी होंगे। साँस ने उनसे कहा - " आप मेरे घर आइए। खाना खाकर जाना।" तीन बूढों में से एक बोला - " हम तीनों ऐसे वहाँ नहीं आ सकते। मैं धन हूँ, ये मेरे मित्र विजय और प्यार हैं। आप हम में से किसी एक को ही घर बुला सकते हैं।" साँस बोली कि मैं अपने पति से पूछ्कर बताऊँगी। वे अंदर गयीं। अपने पति से सारी बातें बतायीं। पति बोल उठे,

" हमन को ही बुला लेंगे, ताकि हमारा घर संपत्ति से भर जाए। " यह सुनकर साँस बोली, "नहीं हम विजय को बुला लेंगे, ताकि हमें हर समय विजय मिल जाएगी।" यह सुनकर बहू वहाँ आयी। वह बोली, "माँजी, हम प्यार को घर पर बुला लेंगे, अगर प्यार है तो विजय और धन दोनों मिल जाएँगे।" साँस बोली, " यह तो अच्छी बात है, हम पहले प्यार को ही बुलाएँगे।"

इतना कहकर वह बाहर चली गयी। वहाँ तीनों बूढे उनका इंतज़ार कर रहे थे। उनको देखते ही साँस बोली, "धन भैया और विजय भैया, आप मुझसे क्षमा करें। हम पहले प्यार को ही अंदर बुला सकते हैं।" यह सुनकर विजय बोल उठा, " आपने ठीक ही किया है, अब हम तीनों तुम्हारे घर आएँगे। प्यार के बिना हम दोनों कहीं जाते नहीं हैं। अगर आप धन को या मुझको बुला लेते तो हम तीनों कभी तुम्हारे घर आनेवाले नहीं थे।"

10 August, 2010



' निर्झर ' - श्री रामकुमार वर्मा जी की अनोखी कविता । देखें इसकी विडियो ...


" चित्र पर क्लिक करें और यूटूब से डाउनलोड करें । "

16 July, 2010

प्रेमचंद की ' पूस की रात कहानी ' की वीडियो यहाँ से डाउनलोड करें

(डाउनलोड करने में कुछ दिक्कत है तो स्कूल की SITC से पूछें । )

भाग १

भाग २

भाग ३








14 May, 2010

नवीं कक्षा के पाठपुस्तक में जो गोदान की शुरुआत दी गयी है, सहायता के लिए गोदान उपन्यास का संक्षिप्त रूप:-
पाँव तले दबी गर्दन : --
गोदान
मुख्यपात्र परिचय
होरी – बेलारी गाँव का किसान
धनिया – होरी की पत्नी
गोबर – होरी का पुत्र
भोला - दूसरे गाँव का बूढा किसान

झुनिया - भोला की विधवा पुत्री
रायसाहब अमरपाल सिंह - बेलारी गाँव का ज़मीन्दार
हीरा और शोभा - होरी के भाई
पुनिया - हीरा की पत्नी
नोहरी - भोला की दूसरी पत्नी

कामता और जंगी - भोला के पुत्र



होरी की कहानी - पत्नी धनिया, पुत्र गोबर। होरी किसान की एकमात्र अभिलाषा थी कि उसके घर के सामने गाय बाँधना। वह गाँव के ज़मीन्दार रायसाहब के यहाँ अक्सर जाया करता था। भोला दूसरे गाँव का बूढा किसान आकर ज़मीन्दार जी से गाय ले गया। रास्ते में होरी ने उसे देख लिया और भूसा देकर कुछ दिन के लिए वह गाय अपने घर ले गया। हीरा और मोती, होरी के भाई थे पर उनके बीच की संबंध ठीक नहीं थी। हीरा ने गाय को ज़ह देकर मार डाला। पुलीस के भय में हीरा गाँव से भाग गया।
गोबर और भोला की विधवा पुत्री झुनिया प्रेमबद्ध हो गये। कुछ दिन बीत जाने पर झुनिया गर्भवति हो गयी। गोबर झुनिया को अपने घर में शरण दिया और गाँववालों की डर से गाँव छोडकर भाग गया। अब झुनिया का संरक्षण होरी के कंधों पर आ गया।

भोला गाय वापस लेने आया। इधर झुनिया को होरी ने शरण दे रखा था, यह देखकर भोला गाय वापस माँगने लगा तो होरी ने अपने दोनों बैल भोला को दे दिया। बैल के नष्ट हो जाने पर होरी किसान न रहा था। उसको दूसरों के खेतों में काम करना पडा। वह गाँव में कंकड की खुदाई करने लग। होरी का स्वास्थ्य बुरी हो गयी थी। फिर भी वह काम करता रहा। कुछ दिन बाद गोबर वाप
आ गया। उसने भोला से अपने बैल वापस ले आया पर होरी इसे स्वीकारने के लिए तैयार न हुआ। गोबर झुनिया को लेकर चला गया। कुछ दिन बाद हीरा वापस आया और होरी से क्षमा माँगा।
अब होरी संतोषवान था। जीवन के सारे संकट, सारी परेशानियाँ, सारी निराशाएँ मानो उसके पैरों पर लेट रही थी। पर ईश्वर का निश्च्य तो अंतिम होता है - होरी की मृत्यु
हो गयी। गाँववाले गोदान के लिए धनिया से बोले तो वह मूर्छित होकर गिर पडी।

13 May, 2010

2010 के अध्यापक सशक्तीकरण कार्यक्रम
में ऐ सी टी द्वारा दिखाने के लिए सी डी में दी गयी सामग्रियाँ ।
डी आर जी महोदयों की सहायता के लिए...

क्लिक करके डौणलोड करें…

15 March, 2010

एक छोटी कहानी -- खुशी
दो नन्हे दोस्त रेगिस्तान से होकर चले जा रहे थे। बातों बातों में दोनों में एक छोटी सी बात पर झगडा हो गयी। पहले दोस्त ने दूसरे को थप्पड मारा। दूसरा दोस्त जिसने थप्पड खाया, कुछ नहीं कहा पर, रेत पर ऐसा लिखा - "आज मेरे प्यारे दोस्त ने मुझे थप्पड मारा।"
दोनों आगे बढे। चलते चलते दोनों एक नखलिस्तान पर पहूँच गये। दोनों ने नहाने का निश्चय किया। दोनों पानी में कूद पडे। जो थप्पड खाया, वह तैर न सकता था। वह कीचड में अटक गया। वह बाहर न आ सका। वह डूबने लगा। पहले दोस्त ने उसे बचा लिया। डूब मरने से बच जाने पर दूसरे दोस्त ने सामने वाली चट्टान पर ऐसा लिखा - "आज मेरे प्यारे दोस्त ने मेरी जान बचायी।"

अब पहले दोस्त ने पूछा - "जब मैं ने तुझे मारा था, तो तुम ने रेत पर लिखा। और अब जब मैं ने तेरी जान बचायी तो तुम ने चट्टान पर लिखा। ऐसा क्यों?"


दूसरा दोस्त बोला - "जब कोई हमें हानि पहूँचाता है तो उसे रे
पर ही लिखें, क्योंकि क्षमा रूपी सुहानी हवा उसे मिटा सकती है। जब कोई हमारे लिए अच्छा काम करें तो उसे चट्टान पर खोदकर लिखना चाहिए, क्योंकि आँधी भी उसकी याद को मिटा न सकें।"

तुम्हारे पास जो कुछ है, उसका आँकन मत करो।
आँकन
करो उन लोगों का, जो तुम्हारे लिए जीते हैं।।



खुशी ढूँढने से नहीं आती, उसे बनाने से ही आती है।


13 March, 2010



लियो निकोलायेविच टालस्टाय का जन्म सितंबर 9, 1828 को रूस के तुला के यास्नया पोलियाना में हुआ था। वे माता पिता केपाँच बच्चों में चौथे थे। उनके बचपन में ही माता पिता का देहाँत हुआ था। 1844 म्रें उन्होंने विधि पढना शुरू किया। पढाई बीच मेंही छोडकर उन्होंने कुछ कारोबार शुरू किया। भारी नष्ट होने पर 1851 में वे अपने बडे भाई के पास चले गये। वहाँ से उन्होंने फौजमें भर्ती हो गये और इसी समय लिखना भी शुरू किया।
सितंबर 23, 186
2 को उन्होंने सोफिया आन्ड्रीव्ना बेर्स से शादी की। उनके 13 बच्चे हुए जिनमें पाँच बच्चे छोटी उम्र में ही दुनियाछोडकर चले गये थे। सोफिया के साथ मिलकर टालस्टाय ने "वार आन्ट पीस" और "अन्ना करनीना" लिखा था।
वे 20 नवंबर, 1910 को अपनी 82 वाँ उम्र में दुनिया
छोडकर चले गये।