14 November, 2009

1989 - नवंबर 14 को मोतीलाल और स्वरूपरानी के पुत्र के रूप में जन्म।
1905 - माता पिता के साथ इंग्लैंड गए ।
1910 - केंब्रिड्ज विश्व विद्यालय से स्नातक की उपाधी प्राप्त की।
1912 - भारत लौट आये। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भर्ती।
1916 - कमला कौल से शादी, लखनौ कोंग्रेस में गाँधीजी से मुलाकात।
1917 - नवंबर 19 को पुत्री इंदिरा का जन्म।
1919 - पिताजी के साथ मिलकर 'इंडिपेन्डेन्ड' समाचार पत्र की शुरुआत।
1920 - उत्तर प्रदेश के प्रताप नगर जिले में किसान अभियान चलाए।
1921 - फैसाबाद के किसान अभियान में भाग लेकर जेल में पाँच महीने की कैद ।
1922 - मई 11 को फिर से गिरफ्तारी, लखनाउ जेल में।
1923 - जनवरी में जेल से मुफ्त।
1924 - कोंग्रेस के नेता बनने के कारण फिर से गिरफ्तार और राज्य छोडने की आज्ञा।
1929 - लाहोर के योग में कोंग्रेस के अध्यक्ष के रूप में।
1930 - नमक कानून के खिलाफ काम करने के लिए फिर से गिरफ्तार।
1931 - उत्तर प्रदेश के किसान अभियान में भाग लेने पर गिरफ्तारी और दो साल के लिए जेल।
1934 - कल्कत्ता भाषण के लिए दो साल के लिए फिर से जेल में ।
1935 - आत्मकथा की पूर्ती की।
1936 - फरवरी 28 को कमला जी का निधन। आत्मकथा का प्रकाशन।
1940 - सत्याग्रह करने के लिए गिरफ्तारी।
1942 - 'Quit India' आन्दोलन में भागीदारी।
1944 - 'भारत की खोज में' रचना की पूर्ती की।
1947 - भारत के प्रथम प्रधान मंत्री के रूप में।

1948 - 'भारत की खोज में' रचना का प्रकाशन।
1951 - कश्मीर समस्या में ब्रिटन के खिलाफ सख्त अवाज़।
1954 - 'पंचशील' तत्वों का प्रकाशन।
1957 - ट्रोंबे में भारत का पहला नाभिकीय कारखाना की स्थापना।
1961 - गोआ को भारत में जोड लिया।
1962 - आनमती में पहला सार्वजनिक तेल रिफाइनरी की स्थापना।
1964 - मई 27 विदाई।
(अवलंब : मातृभूमी समाचार पत्र )
13 November, 2009


कस्तूरी का मिरग ज्यों, फिरि फिरि ढूँढै घास ॥
फूल महकते हैं। उनकी महक तो उनके अंदर से
ही आती है। इस प्रकार हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही वास करता है। कस्तूरी मृग यह नहीं जानती है कि कस्तूरी उसकी नाभि में है। वह कस्तूरी की खोज में इधर उधर ढूँढती फिरती है और हिंस्र जंतुओं की पकट में पड जाती है। हम मानव भी ईश्वर की खोज में मंदिरों में जाते हैं और पूजा के रूप में हमारा सब लुटेरों के हाथ गंवा
बैठते
हैं।

और कुछ विश्लेषणात्मक टिप्पणियाँ…

मुंड मुडाए हरि मिलै, सब कोई लेय मुडाय ।
बार - बार के मुँडते, भेड न बैकुंड जाए ॥
ईश्वर का वरदान प्राप्त करने के लिए लोग बाल मूंडते हैं। उनका विश्वास यह है कि ऐसा करने से मरने के बाद वे वैकुँठ यानि ईश्वर के पास जा पाएँगे। भेडों को हम हर साल पूरा शरीर मूंडते हैं। क्या
भेड भी वैकुँठ जाएँगे? ईश्वर विश्वास के प्रति अर्थहीन काम करने से कुछ नहीं मिलता है।
10 November, 2009
से उनको ईश्वर से वरदान मिल जाएगा। अगर ऐसा है तो मैं पर्वत की पूजा करूँगा। ईश्वर की मूर्ति बनानेवाली पत्थर तो पर्वत से ही आता है। इस तरह पत्थर की पूजा करने से क्या लाभ? हम को चक्की की पूजा ही करनी चाहिए, क्यों कि चक्की ही संसार के लोगों की पेट भरने के लिए काम करती है।
08 November, 2009
घटनाएँ : जैनी की प्रार्थना।
स्थान, समय : जैनी की झोंपडी, रात का समय ।

पात्र : जैनी, पाँच बच्चे ।
पात्रों की आयु, वेशभूषा :
जैनी - 40 साल की औरत, साधारण मछुआरों का वेश । बच्चे - 10 साल तक के पाँच बच्चे, चादर से ओढे, सिर्फ चेहरा दिखाई पडे।
जैनी का आत्मगत : प्रार्थना करती है।
व्यवहार और भाव : दुख भरा, गरीबी।

((रात का समय। सागर तट की झोंपडी। वातावरण में लहरों की आवाज़। चूल्हे में जलते बुझते कोयले। दीवार पर मछली जाल। सादी शेल्फ पर घरेलू बर्तन-भांडे। एक बडा पलंग। पुरानी बेंचों पर गद्दा। गद्दे पर चादर लिपटाए पाँच बच्चे। जैनी नीचे बैठी है।))
जैनी उठती है। शेल्फ से एक किरासन का दीया लेकर उसे जलाती है और नीचे रखती है। प्रकाश फैलता है। अब सब कुछ साफ साफ दिखाई देता है। जैनी दीवार पर टंगे जालों की जाँच करती है। एक को फटा पाकर उसे लेती है। एक हाथ से जाल पकडकर दूसरे हाथ से शेल्फ से सुई लेती है। दीया के पास आकर बैठती है। जाल लेकर सीने लगती है। पल-पल मे बच्चों को और दरवाज़े की ओर भी देखती है। लहरों की आवाज़ ऊँची उठती है। हवा के कारण दीया बुझ जाती है। प्रकाश कम हो जाता है। हवा चलने की आवाज़ बहुत ऊँची उठती है। जैनी तुरंत उठकर बच्चों को चादर से ओढती है। घुटनों के बल पर खडी होती है। ऊपर हाथ फैलाकर प्रार्थना करती है - "हे भगवान, हमारी रक्षा करो। बेचारे बच्चे रो-रोकर सो गये थे। मेरे पति तो सागर में गये हैं। उनकी रक्षा करें, भगवान!!!" जैनी रोती है।
03 November, 2009

डॉ. किरण बेदी भारतीय पुलीस सेवा की प्रथम वरिष्ठ महिला अधिकारी हैं। उन्होंने विभिन्न पदों पर रहते हुए अपनी कार्य-कुशलता का परिचय दिया है। वे संयुक्त आयुक्त पुलिस प्रशिक्षण तथा दिल्ली पुलीस स्पेशल आयुक्त (खुफिया) के पद पर कार्य कर चुकी हैं। इस समय वे संयुक राष्ट्र संघ के ‘शांति स्थापना ऑपरेशन’ विभाग में नागरिक पुलिस सलाहकार’ के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वर्ष 2002 के लिए भारत की ‘सबसे प्रशंसित महिला’ चुनी गयीं।
डॉ. बेदी का जन्म सन् 1949 में पंजाब के अमृतसर शहर में हुआ। वे श्रीमती प्रेमलता तथा श्री प्रकाश लाल पेशावरिया की चार पुत्रियों में से दूसरी पुत्री हैं। उन्होंने अमृतसर के सेक्रड हार्ट कोन्वेन्ट विद्यालय में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त किया। वहाँ उन्होंने नाशनल केडट कोरप्स में भर्ती हुई। वे बचपन में टेन्नीस की खिलाडी भी रही थी। सन 1968 में अमृतसर के सरकारी महिला कालिज से उन्होंने अंग्रेज़ी में स्नातक की उपाधी प्राप्त की। सन 1970 को उन्होंने पंजाब विश्व विद्यालय से राजनीतिक शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधी प्राप्त की, जिसमें वे प्रथम आयी थी।
सन 1972 में श्री ब्रिज बेदी से उनकी शादी हुई। उसी साल में उन्होंने अपनी सेवा भारतीय पुलीस में शुरू किया था।
सम्मान एवं पुरस्कार
उन्होंने दो सेवा संस्थाओं की स्थापना की हैं। सन 1988 में स्थापित नव ज्योति एवं सन 1994 में स्थापित इंडिया विजन फाउंडेशन। ये संस्थाएं रोज़ाना हजारों गरीब बेसहारा बच्चों तक पहुँचकर उन्हें प्राथमिक शिक्षा तथा स्त्रियों को प्रौढ़ शिक्षा उपलब्ध कराती है। ‘नव ज्योति संस्था’ नशामुक्ति के लिए इलाज करने के साथ-साथ झुग्गी बस्तियों, ग्रामीण क्षेत्रों में तथा जेल के अंदर महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण और परामर्श भी उपलब्ध कराती है। डॉ. बेदी तथा उनकी संस्थाओं को आज अंतर्राष्ट्रीय पहचान तथा स्वीकार्यता प्राप्त है। नशे की रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा किया गया ‘सर्ज साटिरोफ मेमोरियल अवार्ड’ इसका ताज़ा प्रमाण है। उनकी आत्मकथा 'I Dare. It's Always Possible' सन 1998 में प्रकाशित हुआ था। सन 2007 में उन्होंने सेवानिवृत्ती ली।
प्रमुख पद :
दिल्ली यातायात पुलिस प्रमुख
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्युरो
डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलीस, मिजोरम
इंस्पेक्टर जनरल ऑफ प्रिज़न, तिहाड़
स्पेशल सेक्रेटेरी टू लेफ्टीलेन्ट गवरनर, दिल्ली
इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलीस, चंडीगढ़
जाइंट कमिश्नर ऑफ पुलीस ट्रेनीग
स्पेशल कमिश्नर ऑफ पुलीस इंटेलिजेन्स
यू.एन. सिविलियन पुलीस एड्वाइजर
महानिदेशक, होम गार्ड और नागरिक रक्षा
महानिदेशक, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो
राजू और पडोसिन के बीच का वार्तालाप।
राजू : माँ, माँ, दरवाज़ा खोलोना।
(पडोसिन आती है।)
पडोसिन : अरे, राजू बेटा, स्कूल से आ गया क्या?
राजू : अरे मौसीजी, नमस्ते। मेरी माँ कहाँ है ?
पडोसिन : वे सब तो अस्पताल गये हैं। बेटा, तुम मेरे साथ आओ।
राजू : अस्पताल ? क्यों ? क्या हुआ ?
पडोसिन : अरे बेटा, खबराने की कोई बात नहीं। तेरे भाई को ज़रा सी चोट लगी है। डाक्टर से मिलने गये हैं।

राजू : मौसीजी, क्या हुआ मेरे भैया को ? कैसे चोट लगी ?
पडोसिन : बाहर से सडक पार कर रहा था ना, एक सैकिलवाले से टकराया। चोट कुछ ज़्यादा नहीँ है। बस, आते ही होंगे।
राजू : मुझे अभी मेरे भैया से मिलना है। वे कौन से अस्पताल गये हैं ?
पडोसिन : वह सरकारी अस्पताल है ना, वहीं। तू पहले चाय तो पीके जा।
राजू : नहीं मौसीजी, फिर कभी पी लूँगा, मैं अभी अस्पताल जाऊँगा।
पडोसिन : अच्छा बेटा, ज़रा संभालकर जाना।
22 October, 2009
16 October, 2009
11 October, 2009
कुँवर नारायन जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया।

41 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार हिंदी के प्रमुख कवि कुँवर नारायन जी को दिल्ली में हमारे रष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटील ने पिछ्ले मँगलवार को प्रदान किया। सँसद के पुस्तकालय के बालयोगी मंच में यह कार्य संपन्न हुआ।
कुँवर नारायन जी का जन्म 19 सितंबर, 1927 को हुआ था। अब वे अपनी पत्नी और पुत्र के साथ दिल्ली में रहते हैं ।
चक्रव्यूह (1956)
तीसरा सप्तक (1959)
परिवेश : हम - तुम (1961)
आत्मजयी (1965)
आकारों के आसपास (1973)
अप्ने सामने (1979)
कोई दूसरा नहीं (1993)
आज और आज से पहले (1998)
मेरे साक्षात्कार (1999)
इन दिनों (2002)
साहित्य के कुछ अंतर - विषयक संदर्भ (2003)
वाजश्रवा के बहाने (2008)
'आत्मजयी' के लिए हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार (1971)
'आकारों के आसपास ' के लिए प्रेमचंद पुरस्कार (1973)
'अपने सामने' के लिए कुमारनाशान पुरस्कार (1982) और तुलसी पुरस्कार (1982)
हिंदी संस्थान पुरस्कार(1987)
'कोई दूसरा नहीं' के लिए व्यास पुरस्कार (1995), भवानी प्रसाद मिश्रा पुरस्कार (1995), शतदल पुरस्कार (1995) और साहित्य अकदमी पुरस्कार (1995)
लोहिया पुरस्कार (2001)
कबीर पुरस्कार (2001)
शलाका पुरस्कार (2006)
और अब ज्ञानपीठ पुरस्कार (2008)
आईए उनकी एक कविता पढें :-
क्या वह नहीं होगा ??
क्या फिर वही होगा
जिसका हमें डर है ?
क्या वह नहीं होगा
जिसकी हमें आशा थी ?
क्या हम उसी तरह बिकते रहेंगे
बाज़ारों में
अपनी मूर्खताओं के गुलाम ?
क्या वे खरीद ले जाएँगे
हमारे बच्चों के दूर देशों में
अपना भविष्य बनवाने के लिए ?
क्या वे फिर हमसे उसी तरह
लूट ले जाएँगे हमारा सोना
हमें दिखलाकर काँच के चमकते टुकडे ?
और हम क्या इसी तरह
पीढी - दर - पीढी
उन्हें गर्व से दिखाते रहेंगे
अपनी प्राचीनताओं के खंडहर
अपने मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे ?

(कविता का मलयालम रूप देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें।)
06 October, 2009
हर अक्तूबर के पहले हफ़्ते हम जंगली जीवों की संरक्षण के लिए मनाते हैं। वे जानवर और वनस्पति जो मानव नहीं पालते या खेती नहीं करते उनको ही हम जंगली जीव कहते हैं। इसके बारे में जानकारी प्राप्त करना और उनके सहारे ही मानव की सुरक्षा हो सकती है, यह बोध होने के लिए ही हम इस प्रकार का एक हफ्ता मनाते आ रहे हैं। सिर्फ जंगलों में ही नहीं, हमारे घरों में और हमारे आस-पास कई ऐसे जानवर रहते है, जिसे हम ज़्यादा ध्यान नहीं देते। गिलहरी, चूहा, मेंढक, नेवला, मगर, अनेक प्रकार के साँप, तितलियाँ, सुअर आदि हमारे आस-पास दिखाई देनेवाले ऐसे जानवर है, जिन्हें हम बिना कोई कारण के नाश करते हैं। ये बेचारे जानवर के मुख्य प्रश्न क्या क्या हैं, उनका संरक्षण कैसे करें, इस के लिए हमारे देश के नियम क्या क्या हैं आदि बातों की जानकारी छात्रों को देने के लिए ही हम ऐसा एक प्रमुख हफ्ता मनाते आ रहे हैं।
केरल के जंगल, नदियाँ, जंगली जीव आदि सब हमारी संपत्ती है, स्थिरता है, अभिमान है। ये सब आनेवाली पीढियों का हक हैं। इनको बिगाडने के लिए हम किसी भी शक्ती को मौका नहीं देंगे। हम इस धरती पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा करते हैं कि अपने देश के जंगल, जलस्रोत और हरीतिमा को कायम रखेंगे।
जंगल के पहरेदार हम ही हैं।
जंगल के पहरेदार हम ही हैं।
जंगल के पहरेदार हम ही हैं।
05 October, 2009
मानव मनु की संतान
आज कितना स्वार्थी है
अकेला खाता है।
अकेला पीता है
पास में पडोसी
कितने दिन से भूखा-नंग
पडा हो
मरा हो
कौन जाने?
परिवार के दो-चार सदस्यों की
उदर-पूर्ति में
समझता है आज का मानव
अपने जीवन का कल्याणमय लक्ष्य।
और -
हाँकता है डींग सभ्यता के विकास की
पहनकर दो-चार उजले कपडों को।
जीने को सब जीते हैं
मानव भी
पशु भी
लेकिन अंतर होता है दोनों में -
जीने का
बुद्धी का
और -
क्रिया शक्ति का
जो नहीं रहा आज के मानव में ।
04 October, 2009
मोहन राकेश जी के बारे में कुछ बातें…

इनका जन्म 8 जनवरी, 1925 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। ये ' नई कहानी ' के वरिष्ठ लेखक हैं। न आनेवाला कल, अन्धेरे बन्द कमरे, अन्तराल, बकलामा खुदा आदि उनके उपन्यास हैं। इन्होंने कई नाटक भी लिखे हैं - आधे अधूरे, लहरों के राजहँस, आषाढ का एक दिन आदि और मोहन राकेश के संपूर्ण नाटक में अन्य नाटक संकलित है। उनकी कहानियाँ दस प्रतिनिधी कहानियाँ और रात की बाहों में हैं। इन्होंने दो संस्कृत नाटकों का अनुवाद भी किये हैं शाकुँतलम और ...
उनका निधन 3 जनवरी, 1972 को हुआ था।
उनकी एक डायरी देखें…

उनकी किताबें…

राष्ट्रीय रक्तदान दिन ।

रक्त की विशेषताएँ क्या क्या हैं?
रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है जो रक्त वाहिनियों के अंदर विभिन्न अंगों में लगातार बहता रहता है। रक्तकण तीन प्रकार के होते हैं, लाल रक्त कणिका, श्वेत रक्त कणिका और प्लैटलैट्स। मनुष्य-शरीर में करीब पाँच लिटर रक्त विद्यमान रहता है।
रक्तदान जीवनदान है, क्यों?
प्लाज़मा के सहारे रक्तकण सारे शरीर में पहूँच पाते हैं और वह प्लाज़मा ही है जो आंतों से शोषित पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाता है और पाचन क्रिया के बाद बने हानीकारक पदार्थों को उत्सर्जी अंगो तक ले जा कर उन्हें फिर साफ़ होने का मौका देता है। श्वेत रक्त कणिकाएँ हानीकारक तत्वों तथा बिमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं से शरीर की रक्षा करते हैं। प्लेटलेट्स रक्त वाहिनियों की सुरक्षा तथा खून बनाने में सहायक होते हैं। मनुष्यों में रक्त ही सबसे आसानी से प्रत्यारोपित किया जा सकता है। रक्त के सहारे ही मनुष्य में जीवन कायम रखता है। दुर्खटनाओं या कुछ बीमारियों के कारण मनुष्य में रक्त की कमी हो सकती है। इससे बचने के लिए हम दूसरों को रक्तदान कर सकते हैं। दूसरों का जीवन बनाए रखना भाईचारा है, मानवता है। हर स्वस्थ मनुष्य महीने में एक बार रक्तदान कर सकता है। खून लेने-देने में बहुत सावधानी की आवश्यकता भी होती है।





